"जाग रहे हैं" Jaag rahe hain

हमने देखी  हैं रातें जागते हुए, कुसूर न तो आँखों  का था न रातों का,
कुसूर तो हमारा था कि हम तय न कर सके कि कौन जाग रहा है ,

लोगो को हम यूँ भी कह देते कि हमे निन्द्रभाव है, 
हर वक्त सुध - बुध खोये बैठे  हैं हम, न जाने मन कहाँ भाग रहा है,   

उस  जिद को न हम छोड़ पाए, न और कोई हासिल कर सका कैसे कह देते कि हम हार गए हैं,
फिर तो मनो एक हवा का झोका आया और हम गिर गए, वाकई लगता है अब कि हम जाग रहे हैं,

वरुण पंवार

"जावा की अनोखी प्रेम कहानी" Java ki anokhi prem kahani

इस कविता के माध्यम से मैं एक सन्देश देना चाहता हूँ, कि स्नेह एक ऐसी भाषा है, जो पृथ्वी रूपी संसार में हर प्राणी को जीने का आधार प्रदान करती है और प्रेम भाव से किसी को भी जीता जा सकता है,  ये कविता एक गिलहरी(जावा) और मनुष्य के प्रेम प्रसंग का वर्णन करती है,  

"जावा की अनोखी प्रेम कहानी" 

गुमशुदा गुमनाम हुई  मैं, बिछुड़ गयी संसार से  अपने,
मैं  गिल्लु परजाति की  हूँ, पहचान लिया  तो  होगा  सबने,

कुछ दिन  पहले जन्मी थी मैं, आँखें न खुल पाई तब तक,
कैसे, कब और कहाँ  गिरी मैं, ये भी जान न पाई अब तक,

भूख के मारे बिलक रही थी, चीख-चीख कर बता रही,
कोई समझ न पाया मुझको, मेरे साथ ये खता हुई,

एक स्पर्श ने हिला दिया तब, आस भी उठकर खड़ी हुई,
दाना-पानी नसीब हुआ और उसकी छाँव में बड़ी हुई,

कौन था मेरा वो हितकारी, सुबह शाम मुझको सहलाये,
आँखें खुली तो समझ में आई, ये मानव जाति का कहलाये,

उसने आगे हाथ बढाया, भयभीत हुई मैं भाग खड़ी,
फुदक-फुदक कर दुपक गयी, चादर और पर्दे पे चढ़ी,

उसने मुझको जकड लिया, स्पर्श ये कोई नया नहीं,
निर्भीक हुई एहसास हुआ पर ऐसी-कैसी सजा हुई,

जावा-जावा सुनती थी, आवाज़ भी उसकी जान गयी,
नाम दिया जब जावा उसने, खुद को भी पहचान गयी,

उसका कन्धा राज सिंहांसन, भ्रमण मैं चारो ओर करूँ,
भूख लगे तो उधम मचाऊं, चीख-चीख कर शोर करूँ,

उसका मुझसे रिश्ता ऐसा, अपनों सी वो चिंता करता,
फटकार लगाता, दूर भगाता, ऐसे मुझको डांटा करता,

कुछ समझ हुई तो, छोड़ा उसने, गिल्लों की भरमार जहाँ,
सब मेरे जैसे दिखते थे वो, अपरिचित संसार यहाँ,

रोज़ सुबह मैं मिलने आती, फिर गिल्लों में मैं कहीं गुम हो जाती,
आवाज़ कभी जब सुनती उसकी, दीवानी मैं भागी आती,

एक रोज़ मैं उससे मिलने आई, मैंने चीख-चीख आवाज़ लगाई,
दूध भरा चमचा फैंका उसने, जोर से एक फटकार लगाई,

इतना कि कुछ समझ मैं पाती, एक बिराल ने पंजा मारा,
प्राण-पखेरू मेरे देखें उसको, फूट-फूट रोता बेचारा,

डंडा लेके पीछे दौड़ा, बिराल प्राण बचाती है,
देह जो मेरा बाकी था, वो बच्चो में बाँट आती है,

विधी-विधान का पहिया घूमे, धर्म कर्म सब करते हैं,
ढोंग रचाके छलते हैं, स्नेह भाव से क्यूँ डरते हैं,

मैं महज़ उदहारण हूँ, स्नेह-भाव से मुझे जीत लिया,
जो मानव मेरा प्रीत बना, उसने भी ये सीख लिया,

चींटी क्या है, हाथी क्या है, सारे प्रेम के रोगी हैं,
देह मिला है सबको भिन्न भिन्न, जन्म जन्म के भोगी हैं,

वरुण पंवार     

"मैं और मेरी कविता " Main or meri kavita


इस कविता के  माध्यम  से  मैं  एक  भाव  को  उजागर  करता  हूँ,  कि  एक  गुडिया  जब  बड़ी  हुई  तो उसकी  कल्पना  किस  स्तर  पर  जा  टिकती  है,

मैं कविता पढती थी क्या मैं कविता बन पाऊँगी,
वो किताबो में  रहती थी  क्या मैं  बचपन में  रह  पाऊँगी, 

उसके  शब्दों  की  चंचलता , मेरा  बचपन  मुझको  खलता,
उसको  भुला  रही  हूँ  मैं  कि  मेरा  मन  फिर  है  मचलता,

वो  ही  मेरी  हमदम  थी  वो  ही  मेरी  सखी सहेली,
उसकी  पंक्ति  जीवन  रेखा, जीवन  मेरा लगे  पहेली,

क्या  बुरा  क्या  लगता  अच्छा  इसका  मुझको  ज्ञान  नहीं, 
हर  अक्षर  में  एक  सीख  छिपी  थी  उसको  अब  पहचान गयी,

उसको  लेकर  फिरती   थी  मैं  उसका  ही  गुणगान  करूँ, 
आज  उसको  जब  भुला  गयी  मैं  बचपन  को  याद  करूँ,

हीरा -मोती,  ख़ुशी  थी,  गम  क्या  ?  ये  कविता   थी  बतलाती,
हाथी,  गुड्डा , गुडिया,  तितली ये  सारे  थे  जीवन  साथी,

उससे  ही  मैं  बातें  करती, उसको  ही  मैं  रहती  रटती,
उससे  ही  मैं  गुस्सा  होती, उससे  ही  मैं  रहती  लडती,

मुझको  जितना  आता  था  उतना  ही  बस  कहती  थी  वो,
आज  मैं ये  कहती  हूँ  कि बिल्कुल  मेरे  जैसी  थी  वो,

मेरा  बस्ता,  मेरी  पुस्तक, मेरी  पेन्सिल  सब  मेरी  थी,
आज  मुझको  पता  चला  कि  न  मैं  उसकी  न  वो  मेरी  थी,

कैसा  अद्धभुत  जीवन  है  ये  कैसा  अद्धभुत  इसका  सार,
सुन्दर  मधुर  बचपन  की  यादें  काल्पनिक  कविता  संसार,

जो  मैं  चहुँ,  जो  मैं  सोचूं  वो  मुझको  मिल  जाता  था,
कविता  में  वो  चित्र  सुहाने  मन  मेरा  खिल  जाता  था,

देखूं  उसको  जब-जब  मैं , वो  पूछे  तू  कैसी है, 
मैं  तो  बिल्कुल  बदल  गयी , क्यों  वो अब भी  वैसी  है, 


वरुण पंवार

"कई पहलू जीवन शैली के" kai pehlu jeevan shaili ke

पाटना पे खड़ी के  चिन्ह  लगाना अब  मुश्किल हुआ,
laptop, mobile, touchpad मैं भी full skill हुआ,
आठाना, चाराना की  वो  गोल  मिठाई  अच्छी थी,
pizza, burger , bread -cutlet खाके अब मैं ill हुआ,

घुटनों  के  बल  चलता  था  मैं  कोई  पकड़  तो  लेता  मुझको,

रफ़्तार  की  ये न  गाडी  होती, रास्ता  न  कोई  देता  मुझको,
वक्त  बताएगा  क्या  होगा  ये  भी  सोचा करता  था,
वक्त  हुआ  है  क्या  इस वक्त  इसकी  भी  नहीं  फुरसत मुझको,

मैं  बालक  था  बड़ा  हुआ  क्या  दो चक्षु दो  हस्त  सुहाने,
ऐनक चक्षु  ताड्ती  देखे, keypad  से  क्या  लिखूं  बहाने,
मेरे  चुन - मुन मुझे  सिखाते  playstation  का  ज्ञान हुआ,
बालक  तो  बन  सकता  हूँ  मैं  उद्योग- भवन  को  छोड़ू कहाँ  मैं,

खाया  क्या  है ? क्या खाओगे ?, सुनते हो क्या !!!! मैं  सुन  नहीं  पता  हूँ,
meeting , cheating , order ,  heating  MOM  बनके  रह  जाता  हूँ,
Denis, Newton  पदते- पढ़ते महज कहानी  सी बन जाती  है,
चिंतन - दबाव की  स्थिति  ऐसी, सुनिस्चित  सो  नहीं  पता  हूँ,

दायरा  कितना  था  वो  पहले  बिन  उपाधि राज  किया,
उपाधि  देकर पूछें  मुझसे  क्या  तुने  भई  आज किया ?
मेरे मालिक  मेरे  बच्चे ये हि तो मेरे खुदा  हुए,
एक  खुदा  ने  रोटी  बक्शी  दूजे  खुदा  ने  साथ  दिया,

अनुयायी  हैं  विरोधी  भी , सबकी  सुननी पड़ती  है ,
बीच  भंवर  में  फसा हुआ  हूँ , मेरी  सेना  मुझसे  लडती  है,
व्यर्थ कहूँ   या  लडूं  मैं खुद  से इससे  मेरा  लाभ  नहीं,
प्यार से  सबको समझाता हूँ, और सेना  प्यार मुझे करती  है,

वरुण पंवार

"मानवता का दहन" Maanavta ka dehan

ब्रह्मा  कि  श्रृष्टि  का  कैसा  उपसंहार  हुआ |
जल,  पवन ,  धरा  और  नभ  का  मनुष्य रूद्र  अवतार  हुआ ||

खग,  विहग  को  भक्छ  लिया  अब  मनुष्य  आदम-खौर हुआ |
मानवता  का  त्याग  किया  तो  दानवता  कि  ओर  हुआ ||

लूट ,  फिरौति ,   क़त्ल ,  वासना ,  इसके  अब  हथियार  हुए |
जीवन  मूल्यहीन  हुआ  और  मानव - बम्ब  तैयार  हुए ||

देख  श्रृष्टि  कि  रचना  को ,  विष्णु  जल  में  हि  डूब  मरे |
भ्रूण हत्या  का  वर  मिला  तो  महारथी  भी  खुद  पड़े ||

कृष्ण ,  सुदामा ,  शम्भू ,  बजरंग  सैर  सपाटा  करते  हैं |
रेलगाड़ी  की  बौगी  में  ही  नृत्य - करतब  करते  हैं ||

सरकार  साहूकार  हुई  ये  जग  में  गुंडाराज  हुआ |
दल्य - निर्दल्य  की  खीर  बनी ,  मतदाता  दाने  को  मोहताज़  हुआ ||

शोक - सभाएं  जमकर  लगती  उपवास - आन्दोलन  का  दौर  है  ये |
मैं  भी  उनमे  शामिल  रहता ,  अन्ना  जी  का   शोर  है  ये  ||

आतंकवाद  की  भेंट  चढ़  गए ,  कितने  शहर - ग्राम  यहाँ |
देह - आत्मा  बिकती  हैं  अब ,  जीवन  बना  संग्राम  यहाँ ||

पाकिस्तान  नहीं  दुश्मन  हमारा ,  दुश्मन  ये  संसार  हुआ |
भाई - चारे  का  नाता   टूटा  तभी  वतन  बर्बाद  हुआ ||

 वरुण पंवार 

"माही v/s प्रिन्स" Mahi v/s Prince

इस  कविता  से  मैं  खुदा  से  उन  मासूमो  के  गुनहगारो  को  सज़ा  देने  की  फ़रियाद  करता  हूँ , 

वसुंधरा   की  गोद  में ,  कितने  मासूम  सो  गये |
रह  गया  आँगन  ये  सूना ,  बिन कफ़न  के  जो  गये ||

दोष  क्या  था  उनका ,  मासूम  सी  वो  जान  थी |
भूतल  पर  गड्डा  मौत  का , जान  वो  अनजान  थी ||

जन्म  दिवस  मना रहा  था , कोई  गाना  गा  रहा  था |
देखते  ह़ी  देखते , कोई  मौत  को  बुला रहा था ||

आज  मेरा  वार  था ,  ख़ुशी  का  वो  त्यौहार  था |
सब  चले  गये  थे  घर  को , किसीको  मेरा  इंतजार  था ||

उस  रात  की  वो  बात  थी ,  कदम  कदम  पर  मौत  थी |
खुद  से  मैं  यूँ  लड़  पड़ी ,  क्यों  कुएं  में  फिसल  पड़ी ||

कोई  खींचता  चला  गया ,  वो  रास्ता  अजीब  था |
कोई  हाथ  न  पकड़  सका , येही  मेरा  नसीब  था ||

एक  आवाज  मेरी  थी ,  वो  मुझको  ह़ी  पुकारती |
गड़  गयी  खड़ी खड़ी ,  मैं  आंसमां  निहारती  ||

दम  निकल  रहा  था  मेरा ,  मन  मचल  रहा  था  मेरा |
सिस्कियों  की  मौत  थी ,  बदन  भी  जल  रहा  था  मेरा ||

आखरी  सलाम  कर ,  उस  हिचकी  ने  सुला  दिया |
मोती  मेरा  गिर  सका  न , कितनो  को  रुला  दिया ||

प्रिंस कोई  बन  गया,  प्रिंसेस  मैं  न  बन  सकी |
मात  कोई  दे  गया ,  मैं  मौत  से  न  लड़  सकी ||

दर्जनों  की  मौत  का  जिम्मेदार  कौन  है ?
मासूमो  की  मासूमियत  का  हत्यारा  कौन  है ?


वरुण  पंवार

"तुम मुझे मिले" Tum mujhe mile

एक  अनुभव   किसीके  मिलने  और  बिछुड़ने  पर,

हम मिले  तुम्हें जाने  मुझे तुम मिले,
चाहतों के  न  जाने  क्यों  चल  पड़े  सिलसिले,
वफाई  थी  मेरी  या  चाहत  तुम्हारी  थी
जिसपे  हमने  अपनी  हर  ख़ुशी  निहारी  थी ,
हर  नज़ारे  रंगीन  लगने  लगे  बस  प्यार  का  जादू  था,
दिल  तुम्हारा  जान  तुम्हारी  न  खुद  पे  काबू  था,
कुछ  न  कहके  भी  जाने  क्यों  बेवफाई  के  दाग  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

हर  ख़ुशी  मेरी  तुझे  न  मिल  सकी,
हर  गम  भी  मेरा  अब  मेरा  न  हो  सका,
जाने  क्यों  लगता  था  कि  कोई  साथ  है  मेरे,
जबकि  मेरा  साया  भी  मेरा  न  हो  सका,
जब  साथ  रहे  वो  तो  भी  तडपते  थे  मुझे,
जब  दूर  गए  वो  तो   भी  तडपते  थे  मुझे,
हर  पल  पे  तेरा  नाम  लिखा  जितने  भी  पल  मुझे  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

वो मोहब्बत  के  दिन,  मोहब्बत  कि  रातें  कैसी  थी,
कहतें  हैं  हम  बस  अश्कों कि  बरसातें  थी,
डूब  गए  इस  कदर  हम  तुम  एक  लगने  लगे,
दूर  होकर  भी  अक्सर  हम  पास  रहने  लगे,
हर  आहट  तुम्हारी  मुझे  मजबूर  करती  थी,
नींद  पास  आती  मेरे  तो  वो  दूर  करती  थी,
रूठ  गया  ज़माना  भी  जब  हम  दो  दिल  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

छुपके  से   तुम्हें  बुलाना  नज़रों  से  नज़रें  मिलाना,
जो  बात  अधूरी  होती  थी  उन्हें  पलकों  से  बताना,
मासूम  चेहरा  प्यारी  आँखें  मीठे  होंठ  तुम्हारे,
कहदो  सबको  बारी - बारी  मुझे  न   पुकारे,
तुम्हारी  सादगी  के  हम  हमेशा  दीवाने  रहेंगे,
हर  कदम  हर  मोड़  पर  प्यार  है  तुमसे  कहेंगे,
क्या  कहें  किस  कदर  हम  तुम्हारी  चाहत  कि  आग  में जले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

वो  नाज़ुक  बदन  वो  घनी  जुल्फें  और  हँस  के  शर्माना,
हम  जब  रूठ  जाएँ  तुमसे  कुछ  कहो  न  फिर  घबराना,
तोड़  दिया  मुझे  छोड़  दिया  दिल से  आह  नहीं  रूकती,
चाहत  जो  मुझे  मिली  नहीं  वो  तेरी  हो  नहीं  सकती,
पहले  तनहा  हम  थे  मगर  इतने  तनहा  न  थे  कभी,
अपने  भी  अपने  रहे  नहीं  और  बेगाना  कहतें  हैं  सभी,
टूट  गया  सपनो  का  आँगन  उसमे  न  कोई  अब  फूल खिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

तुम मुझे  मिले
 वरुण  पंवार