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"आशिक डूबा परिंदा है" Aashiq duba parinda hai


आशिक डूबा परिंदा है, उसे डूबा ही रहने दो,
मुहब्बत प्यार का दरिया है, उस दरिया को बहने दो,
कोई ये कह नहीं सकता परिंदा उड़ रहा होगा,
मुहब्बत चीज ही ऐसी है, कोई भी डूब जाता है,

मोहब्बत खेल का प्रांगण है, इसमें खेलते रहना
अगर जो हार होती है, तो उसको झेलते रहना,
यहाँ दुश्मन कई सारे तेरे दर्शक बने बेठे,
अगर सच्चा खिलाडी है तो एक दिन जीत जायेगा, 

यहाँ पर इश्क और किस्मत के बाज़ीगर बड़े बेठे,
बड़ी इस भीड़ में कितने, मुहब्बत को गवा बेठे,
यहाँ गिरते हैं पत्ते पेड़ से सब, जब वसंत आए,
और कुश्किस्मत उन्हें कहते हैं जो उनपे ठहर जाते हैं,

वाहन  है मुहब्बत का सवारी भी जरुरी है,
तो मंजिल पे भी जाना है तो मकसद भी जरुरी है,
अगर खाली है जो गाडी तो मंजिल पे चले जाओ,
सवारी का क्या है वो कहीं पर मिल ही जायेगी,

ये पाठ है ऐसा जिसे कोई पढ  नहीं पता,
एहसास ही डिग्री है कि उसको सब कुछ है फिर आता, 
लिखना नहीं पढ़ना नहीं जो उसकी एक हाँ है तो, 
विफलता से सफलता का वो आनंद आ ही जाएगा, 

वरुण पंवार

"तुम मुझे मिले" Tum mujhe mile

एक  अनुभव   किसीके  मिलने  और  बिछुड़ने  पर,

हम मिले  तुम्हें जाने  मुझे तुम मिले,
चाहतों के  न  जाने  क्यों  चल  पड़े  सिलसिले,
वफाई  थी  मेरी  या  चाहत  तुम्हारी  थी
जिसपे  हमने  अपनी  हर  ख़ुशी  निहारी  थी ,
हर  नज़ारे  रंगीन  लगने  लगे  बस  प्यार  का  जादू  था,
दिल  तुम्हारा  जान  तुम्हारी  न  खुद  पे  काबू  था,
कुछ  न  कहके  भी  जाने  क्यों  बेवफाई  के  दाग  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

हर  ख़ुशी  मेरी  तुझे  न  मिल  सकी,
हर  गम  भी  मेरा  अब  मेरा  न  हो  सका,
जाने  क्यों  लगता  था  कि  कोई  साथ  है  मेरे,
जबकि  मेरा  साया  भी  मेरा  न  हो  सका,
जब  साथ  रहे  वो  तो  भी  तडपते  थे  मुझे,
जब  दूर  गए  वो  तो   भी  तडपते  थे  मुझे,
हर  पल  पे  तेरा  नाम  लिखा  जितने  भी  पल  मुझे  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

वो मोहब्बत  के  दिन,  मोहब्बत  कि  रातें  कैसी  थी,
कहतें  हैं  हम  बस  अश्कों कि  बरसातें  थी,
डूब  गए  इस  कदर  हम  तुम  एक  लगने  लगे,
दूर  होकर  भी  अक्सर  हम  पास  रहने  लगे,
हर  आहट  तुम्हारी  मुझे  मजबूर  करती  थी,
नींद  पास  आती  मेरे  तो  वो  दूर  करती  थी,
रूठ  गया  ज़माना  भी  जब  हम  दो  दिल  मिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

छुपके  से   तुम्हें  बुलाना  नज़रों  से  नज़रें  मिलाना,
जो  बात  अधूरी  होती  थी  उन्हें  पलकों  से  बताना,
मासूम  चेहरा  प्यारी  आँखें  मीठे  होंठ  तुम्हारे,
कहदो  सबको  बारी - बारी  मुझे  न   पुकारे,
तुम्हारी  सादगी  के  हम  हमेशा  दीवाने  रहेंगे,
हर  कदम  हर  मोड़  पर  प्यार  है  तुमसे  कहेंगे,
क्या  कहें  किस  कदर  हम  तुम्हारी  चाहत  कि  आग  में जले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

वो  नाज़ुक  बदन  वो  घनी  जुल्फें  और  हँस  के  शर्माना,
हम  जब  रूठ  जाएँ  तुमसे  कुछ  कहो  न  फिर  घबराना,
तोड़  दिया  मुझे  छोड़  दिया  दिल से  आह  नहीं  रूकती,
चाहत  जो  मुझे  मिली  नहीं  वो  तेरी  हो  नहीं  सकती,
पहले  तनहा  हम  थे  मगर  इतने  तनहा  न  थे  कभी,
अपने  भी  अपने  रहे  नहीं  और  बेगाना  कहतें  हैं  सभी,
टूट  गया  सपनो  का  आँगन  उसमे  न  कोई  अब  फूल खिले,
फिर  सोचा  कि क्या  कुछ  किया  था  जो  तुम  मुझे  मिले,

तुम मुझे  मिले
 वरुण  पंवार