आज फिरसे लिख रहा हूँ इंकलाब खूनसे, कैसे छोड़ू देश और मर जाऊ सुकून से।
सदियों पहले देश को जो सींचा जिसने खून से, वो क्रांति कारी सूरवीर बनगए जूनून से।
गांधीवाद है विवाद सियासतों के सिलसिले उपवास का उपहास करते ये नाथूराम गोडसे।
वांगचुंग को कैद करके ले उड़े तो सोचते, आत्मा गयी नहीं है अब जंतर मंतर खोजते।
तानाशाही की निसानी फ़ौज और पुलिस बैमानी आंसू गैस, बम पिस्तौल, लाठी- गुंडे की जुबानी।
नाम पट्ट छुपा रहे थे, चेहरे को भी ढक रहे थे, कौन हो जब पूछो उनसे, लाठी मार हंस रहे थे।
देश का भविष्य ऐसे दिल्ली में सिसक रहा था, ऊपरी सदन जहाँ वहां रक्त भी टपक रहा था।
भारत माता रो रही थी, संविधान गिर पड़ा था, तिरंगा मसल रहे थे, लोकतंत्र भी जल रहा था ।
राष्ट्र गान की आवाज गूंजती चली गयी थी, बेटियों की आबरू भी रोड पे बिखर गई थी।
जख्म जो मिले हमे वो हमको ही पुकारते, सहनसील बनके अपने भविस्य को सुधारते।
जो देश को मिटा रहे वो रंगा-बिला कौन हैं, गणतंत्र का षड्यंत्र है जो सुप्रीम कोर्ट मौन है।
कैसे मौज कर रहे दरिंदे इस राष्ट्र के, अंधे बेहरे हो गए हैं मनो पुत्र धृत राष्ट्र के।
छल कपट के जादूगर, राम जी के सौदागर, क़त्ल करके बैठे हैं कितनो के जला दिए घर।
बेटियों के चीर हारता, चीक यु पुकारती, गड गयी खड़ी खड़ी वो आसमा निहारती।
हिसाब तो हिसाब है बराबरी का ख्वाब है, चौकीदार चोर है कातिलों का बाप है।
झूट का सहारा है भक्तो का ये प्यारा है चाय का पता नहीं पर जहर ये पिलाता है।