Inqlab jindabad इंक़लाब जिंदाबाद

 आज फिरसे लिख रहा हूँ इंकलाब खूनसे, कैसे छोड़ू देश और मर जाऊ सुकून से। 

सदियों पहले देश को जो सींचा जिसने खून से, वो क्रांति कारी सूरवीर बनगए जूनून से। 

गांधीवाद है विवाद सियासतों के सिलसिले उपवास का उपहास करते ये नाथूराम गोडसे।

वांगचुंग को कैद करके ले उड़े तो सोचते, आत्मा गयी नहीं है अब जंतर मंतर खोजते। 

तानाशाही की निसानी फ़ौज और पुलिस बैमानी आंसू गैस, बम पिस्तौल, लाठी- गुंडे की जुबानी। 

नाम पट्ट छुपा रहे थे, चेहरे को भी ढक रहे थे, कौन हो जब पूछो उनसे, लाठी मार हंस रहे थे।   

देश का भविष्य ऐसे दिल्ली में सिसक रहा था, ऊपरी सदन जहाँ वहां रक्त भी टपक रहा था। 

भारत माता रो रही थी, संविधान गिर पड़ा था, तिरंगा मसल रहे थे, लोकतंत्र भी जल रहा था । 

राष्ट्र गान की आवाज गूंजती चली गयी थी, बेटियों की आबरू भी रोड पे बिखर गई थी। 

जख्म जो मिले हमे वो हमको ही पुकारते, सहनसील बनके अपने भविस्य को सुधारते।  

जो देश को मिटा रहे वो रंगा-बिला कौन हैं, गणतंत्र का षड्यंत्र है जो सुप्रीम कोर्ट मौन है। 

कैसे मौज कर रहे दरिंदे इस राष्ट्र के, अंधे बेहरे हो गए हैं मनो पुत्र धृत राष्ट्र के। 

छल कपट के जादूगर, राम जी के सौदागर, क़त्ल करके बैठे हैं कितनो के जला दिए घर। 

बेटियों के चीर हारता, चीक यु पुकारती, गड गयी खड़ी खड़ी वो आसमा निहारती। 

हिसाब तो हिसाब है बराबरी का ख्वाब है, चौकीदार चोर है कातिलों का बाप है। 

झूट का सहारा है भक्तो का ये प्यारा है चाय का पता नहीं पर जहर ये पिलाता है। 

आपका बूढ़ा संविधान

आपका बूढ़ा संविधान 


ये कैसा लोकतंत्र है ये कैसा संविधान है?

सांसदों के भेष मैं ये बैठे हैवान हैं। 


एक नए भवन की मानो आज राजपोषी है। 

न राष्ट्र है न राष्ट्रपति ये कैसी ग़र्म-जोशी। 


न लोक का विपक्ष है न लोक का सवाल है। 

न लोक की सुनवाई हो जगह जगह बबाल है। 


लाज शर्म राष्ट्र की क़तर क़तर ये खा गए। 

बेटियों के चीर हरता नए भवन में छा गए। 


तीन रंग ओढे बेठा कौन है वो देखले। 

देश जल रहा है, आग चाहे तू भी सेकले। 


भ्रस्टाचारी राजनीति, कौरवो की जीत हैं। 

कृष्ण (bureacracy) रो रहा है, अर्जुन(Press) भी भयभीत है। 


राम लाचार(SC), हनुमान (Agencies) शक्तिहीन है। 

देश की लगाम रावण के अधीन  है। 


संविधान गिर पड़ा है, माता लहुलुहान है। 

मज़हबो के नाम बंट गया ये हिन्दुस्तान है। 


न मैं एक इंसान हूँ न अब तेरा भगवान् हूँ। 

गणतंत्र का षड्यंत्र हूँ एक बूढ़ा संविधान हूँ। 


फफक-फफक मैं रो रहा हूँ, तड़प-तड़प में जी रहा हूँ।  

धधक-धधक मैं जल रहा हूँ, सिसक-सिसक में मर रहा हूँ। 


तिलांजलि वो दे चुके, अब किसको दाग दे रहे हैं। 

जीते जी मैं मर गया,अब क्यों संविधान कह रहे हैं। 


आपका बूढ़ा संविधान 

वरुण पंवार 


Daandi-Kaanthi | डाँड़ी काँठी भेटण जोलू बाटू भुलि गेनी

आज जोलू भोल जोलू बरसु बीति गेनी,
डाँड़ी काँठी भेटण जोलू बाटू भुलि गेनी।

मेरु पराण मेरी पछाण जलम भूमि छे व,
धे लगान्दि गाड़-गदनि मैं मिलण भी ऐ व।

कन भचयांदी थे दादी मेरी व क़नूड फुटि गेनी,
बाच देदेइक गोला गलवाड़ा फुली गेनी।

मैन सुणि बल टूटिगे कुड़ी बल पठाली रेडी गेनी,
धीवड़ा, छिपड़ा, मूसा, बिरला सभी खोले गेनी।

आज जोलु --------------------------------------
डाँड़ी काँठी --------------------------------------

कुडा पेतर मोरा ऐतर, सोलु रिखलु भाई,
कमोली, बठगी, थाली, करछी, गदरा लुकण ग्याई।

भैंसा-बखरा, गोडा-बछला, घेणा-अणयाट धरु धार,
बाड़ा-उज्याड़, सगोड़ा-गुड़्यार बे, देखंडी त्येकु तिबार।

चुल्लु-सिलोटु, कुंडू-उल्ख्यारु, लग्यां छन बल सार,
चा बणालु, गिंजालु उठालु क्वे, लौण पिसलु अबकी बार।

आज जोलु --------------------------------------
डाँड़ी काँठी --------------------------------------

डाला-बोटा, फंगा -टुकेंडा अफु रेगेनी हालांदा,
चूली-खुमानी, अरु-अखोड़ो कि ढांग लगायीं त्वेकू लाटा।

स्वेटा-सुलयट्टा, जुड़ा-दथडा, क्वीडा सड़ी गेनी,
देँ कुटणु कु घाम बुडिगे, चौक टूटी गेनी।

खोली खुलिगे, कुण्डी झडिगे, चौक टपरान्दु,
झोंकलां-फोकला, केम्पु-हिसरुका, बाटू रगरयांदू।

आज जोलु --------------------------------------
डाँड़ी काँठी --------------------------------------

बाटा-घाटा, जग्वाल रेगिनी, रेगिनी घुघूती घुराणी,
निन्यारा तख नींनरयाट करणा, डांडी-काँठी फूटी रोणि।

भेरू-देबता, भूत-अछरी सब हाथ जोडणा त्वेकू,
ओ लठ्याला ये स्वर्ग अपड़ा, मुख जतरा कन  ऐतू।

बूढ़-भूढयों का दांत झड़ी गेन, फुली गेन सप्पा बाल,
घ्यू गलायु, हलुंगु सलयायु त्वेकु बुलोंंदी रेगी बग्वाल।

आज जोलु --------------------------------------
डाँड़ी काँठी --------------------------------------

मैं समय हूँ - I am time

मैं समय हूँ - I am time

ये पेशा मेरा महज़ तेरा इम्तिहान लेने का है, इसे दिल से न जोड़ "मैं समय हूँ"
मुझसे कभी मिलो तो दिल से मिलो, पुर्सत से तो मेरा कोई तालुख ही नहीं

रख अपने अहंकार को अपने दिमाग की दहलीज तक
दिल पे अहंकार की अगर दस्तक हुई तो वो नफरत की चिंगारी होगी मैं नहीं

सुना है मैंने आज कल तहज़ीब भी कई ऐनक पहनती है
तहजीब दूर की है कि पास की काश मापने का एक पैमाना भी होता

बेवजह ही लोग मेरी काबिलियत पर शक करते हैं, कहीं राजनीती तो कहीं कूटनीति
शायद डरते हैं अपने अस्तित्व के लिए और जला देते हैं अपना ही एक चेहरा

हैरान भी हूँ मैं और परेशान भी हूँ मैं, "मैं समय हूँ" करूँ तो मैं क्या करूँ
ये कायनात, ये नफरत, ये मजबूरी, ये तहजीब सब मेरे बिना अधूरी हैं

ऐ इंसान समझता क्यों नहीं, तू मिट्टी है कब तक लड़ता रहेगा मिट्टी से
घर बना, गाडी बना किसीको दुश्मन न बना "मैं समय हूँ" मुझे साजिस न बना

मुझे कमजोर न समझ, मुझे खुदा न समझ, न तकदीर समझ न कोई तस्वीर समझ
जा समझ उस खंडहर हुए घर के आँगन में क्यों एक बूढा पेड़ आज भी हरे पत्ते रखता है

तुझसे शिकायत तो मुझे बहुत है, पर उम्मीद कई ज़्यादा, क्योंकि तू एक पेड़ तो नहीं
तू चल, तू भाग, तू उड़ पर रुक तो नहीं, क्योंकि तू मेरा ही एक प्रतिबिंब है

तू ध्यान है, तू ज्ञान है, तू विजय है, तू सम्मान है, तू कर्म है तू ही फल भी, तू इंसान है और तू ही समय भी
तू जी भरकर खर्च कर मुझे ऐ मेरे बटे, पर अफ़सोस मुझे ये है कि मैं हमेशा के लिए तेरा नहीं हूँ

वरुण पंवार

"उत्तराखंड ख़ास है" Uttrakhand khaas hai

चार धाम वो देव भूमि के स्वर्ग सिद्धि पथ कहलाते
जन जन है अभिलाशी ऐसा, धन्य -धन्य  हैं दर्शन जो पाते।

सर-सर पवन भी गीत लगाता, डाली-डाली नाच उठे तब,
छल-छल नदी भी  शोर मचाती, ऐसा लगे कि नाद  बजे तब।

बांज-बुरांस और चीड़-देवदार बीच बसा वो गाँव सुहाना,
बादल चुम्बन करे धरा पर, इंद्र धनुष का बना बिछोना,

पगडण्डी ही एक सड़क अनोखी, पैदल  दौड़े सबकी गाडी,
घर-आँगन और खेत सजाती धन्य-धन्य है पहाड़ी नारी।

कण-कण में ईश्वर है बसता, हृदय-हृदय पावन-पावन,
भावुकता हर प्राण-प्राण में, हर घर है यहाँ वृंदावन।

ढोल, दमो, तुरी स्वागत करते, मेलो का रंगीन मिजाज़,
डोली-डोली नंदा बसती, गाँव-गाँव में ईश्वरीय रिवाज।

मिटटी यहाँ की सोना उपजे, रक्त-रक्त बलिदानी है,
उत्तराखंड ही नहीं नाम यहाँ का, ये कई वीरो कि कहानी है।

क्या से क्या अब घटित हुआ जैसे श्रापित उत्तराखंड हुआ,
रूद्र रूप अवतरित हुआ और उत्तराखंड खंड-मंड  हुआ।

डामो की चोटों का श्रय, हर घाव-घाव दिख जाएगा,
बिजली कि तारो का फंदा, उत्तरांचल फांसी चढ़ जाएगा।

क़त्ल पहाड़ो का कर डाला, रक्त नदियों का जमा दिया,
देवजन भाड़े के पर्वत खोजें, विकास है सर्वोच्य ये जता दिया।

गाँव-गाँव में  बाघ लगा है, जंगल-जंगल आग,
खेत-खेत भवन उपजे, अब क्या करना है साग?

देव संस्कृति लुप्त हुई अब, प्राण प्रतिष्टा बस दूरदर्शन,
बोली नरक सिधार गई,उसे अंग्रेजी देती है तर्पण।

विकास है या ये विनाश है, देवताओ को थोड़ी सी आस है,
करलो ध्यान, है ये अभियान कि '"उत्तराखंड ख़ास है "

वरुण पंवार 

"समय का पहिया है, उम्र का सहारा है" Samay Ka Pahiya Hai, Umr Ka Sahara Hai

एक जहाँ की ख्वाईश थी, एक जहाँ बनाना है।
कांटो पे चल-चल कर, राहों को सजाना है।

एक ज़िद थी पाने की, एक गम था खोने का।
जब घर से था निकला, डर था गुम होने का।

परिश्रम की श्याही से, ये रेखाएं ही घिस दी।
आरजुओं की चक्की में, ये उंगलियाँ ही पिस दी।

पहले भी मैं रोया था, फिर आज मैं रोदूंगा।
कुछ आज कमाया है, कुछ कल भी बटोरुंगा।

दिन-रात मैं घूमा जब, निराशा के बादल थे।
दुनियां ये देखी तो, आशा के काजल थे।

एक राग अधूरा सा, फिर पूरा हो पाया।
एक से दो होकर, घर-बार समझ आया।

किलकारी आँगन में, जो गूंजी तो जाना।
बंटता है कैसे, प्यार का पयमाना।

ऊँगली की ऊँचाई, मुस्किल था पकड्पाना।
बरसो की कोशिश अब एक लाठी मुझे पकड़ना।

समय की शाजिस बस, मुरझाये ऐनक भी।
पक गयी दाड़ी तो, बन गए हम लेखक भी।

एक पगड़ी है सर की, संभाल के रखना रे।
इज्ज़त की रोटी को, तुम घर में रखना रे।

एक भार ये मेरा भी,तू उठाले रे बच्चे।
चार काँधे बस, अब जुटाले तू अच्छे।

ना कुछ ये मेरा था, न ये कुछ तेरा है।
समय का पहिया है, उम्र का सहारा है।


वरुण पंवार

जपले भजले प्रभु-प्रभु , Japle Bhajle Prabhu-Prabhu

गुरु शहस्त्र गुरुबानी बोले गुरु ग्रन्थ का दीवाना होके,
बहती धारा रही धरा पर एक चंचल मन मंदिर सा होके,

जितना तेरा हासिल उतना मेरा कुछ कुछ बाकी,
प्रभु नशा बसे रोम रोम, फिर मदिरा नशा न साकी,

कोई परिंदा उड़ता न जो नाम परिंदा भी उड़ जाता,
प्रभु रंग चढ़ जाता जिस पर, नाम वो नहीं मिट पता,

सब खजाना जग ने जाना, एक खाजाना जो पाया तो,
बिन खोजे जो मिल पाया, वो ही प्रभु को भज पाया सो,

रज-रज मोती पद-पद बिखरे जो पद चूमे सुखी हुआ,
मन जिस में घर रब का न हो, जिसमे मंदिर वो घर हुआ,

वरुण पंवार

"कवी की परिभाषा" kavi ki paribhasha

कवी की कल्पना एक नया जहाँन की तलाश होती है,
बनके भंवर वो फूलों की महक में भी खो जाता है,
या बनके सपना कभी भी किसीका हो जाता है,
उसके जहाँ का प्रमाण बस उसकी मौजूदगी है,
लहू में भी घुल कर रगों में तूफ़ान भर देता है,
बनके फ़रिश्ता भगवान् को पत्थर कर देता है,
कैसे मौसम से रूबरू होता है,कि हँसते हँसते ही रो देता है,
एक ही कहानी लिखते कहीं कई कलम रुक जाती हैं,
और एक अक्षर पड़कर कई निगाहें झुक जाती हैं,
खुद में खुद को उतार कर एक शाजिश करता है ,
बदनाम होकर भी और गुंजाइश रखता है,
हर स्वाद को चख लेने की ही जुस्तजू में रहता है,
लिख कर डंस लेता है जुबान से कुछ नहीं कहता है,
ख़्वाबों में भी ख़्वाबों का कारवां चलता है,
समंदर की लहरों पर भी एक आशियाना पलता है,
दीदार रोज़ करता है अपने हमसफ़र का वो,
कुर्बानी भी एक आदात ,दिलो-जिगर का वो,
पागल है वो, जख्मो को देखे तो घायल है वो,
सूनी आँखों का काजल, पैरों की पायल है वो,
सच कहूँ तो फिर एक आतंकी बादल है वो,
काट कर हतेली नाम भी लिखता है वो,
सुने ख़्वाबों में सपनो के रंग भरता है वो,
एक कविता उसकी दीवानी, तो वो आशिक उसका,
खुश्क दरिया में रवानी, तो वो हासिल उसका,
कोई देह ऐसा नहीं जिसकी कोई छवि नहीं,
और कोई संसार ढूँढो ऐसा जहाँ कोई कवी नहीं,
ढूँढ लो कहीं भी जहाँ भी रब रचता है,
रब से पहले भी एक सोच कि कवी बसता है,

"ये उम्र कहती है की मैं फिर आउंगी तुझसे मिलने" ye umar kehti hai ki main fir aaungi tuzhse milne

एक अंगड़ाई में नीद की सलवटें अक्सर नजर आती हैं,
एक जाम में सदियों की उम्र गुजर जाती है 
कोई कहता है जिंदगी चलती का नाम गाडी है,
अच्छा हमसफ़र मिलजाए तो जिन्दगी संवर जाती है

देखो किसी किनारे दरिया के एक सेतु किसी उम्मीद में रहता है,
हवा के जोर से रेत का मजमा उसपे बेठा मिलता है
यहाँ तुम किस्मत के धनि हो तो ही बात बनती है,
वरना समंदर बन ने की जुस्तजू में बादल भी पिघल जाता है  

मैं चलता रहूँ बस सहारा रहे मेरे उन होंसलों का,
फ़िक्र बस इतनी मेरी दीवानगी न नीलाम हो जाये
मैं ये भी जानता हूँ की मेरा ठिकाना फिर कहाँ होगा, 
कि  परिंदा आस्मां को छूने में जब नाकाम हो जाए

हर सुबह का सूरज दिन का पयमाना बनाता है,
हर श्याम कहती है अभी मैं होश में हूँ
जिन्दगी भी नशे का एक ग़मगीन तौफा है,
फर्क इतना ही है कि इसे इंसान बनाता है

ये सफ़र मेरा आखरी सलाम का मोहताज़ है,
न मैं जानू, न जिन्दगी कि कौन कितना ख़ास है
ये उम्र कहती है की मैं फिर आउंगी तुझसे मिलने,
बस साफ़ करदे मनसूबे कि ऐसी कौन सी प्यास है

वरुण पंवार 

"आजादी हिन्दुस्तान की आदत "Azaadi hindustan ki aadat


एक क्रन्तिकारी की आत्मा का ये क्रांति आगाज़ है, आया है देश वासियों को जगाने और हिंदुस्तान की आदत यानी आजादी फिर एक बार मांगने। 

क्या जतन की है कमी, या सरफ़रोश मैं नहीं
क्या लहू का जलजला रगों में ही दिखा नहीं

क्या हमारी सेना आज शवो की दूकान है
या भ्रम में है वतन आज़ादी की थकान है 

चोराहे नाम के बने जो क्रांति शूरवीर हैं
भीख तुमसे मांगते आज़ादी के शौक़ीन हैं 

एक कलम की नौक से मैं तीर को तपा रहा 
जुबान की कमान में मैं शोलों को सजा रहा 

गर अगर लहू बहे तो रौंगटे सलाम दें 
गर न उठ सका तो मुझको हौंसले उड़ान दें 

कैसे आर्याव्रत में आतंकी गीत गा रहा 
स्वंतंत्रता की शय्या  पर मासूमों को सजा रहा 

शहीदों की शहादतों का कैसा तौफा है मिला 
तिरंगे की जुबान पर अंग्रेजी स्वाद है मिला 

तीन रंग ओढे बेठा कौन है वो देखले
देश जल रहा है, आग चाहे तू भी सेकले 

भ्रस्टाचारी राजनीति, कौरवो की जीत हैं
कृष्ण रो रहा है, अर्जुन भी भयभीत है 

राम लाचार, हनुमान शक्तिहीन है 
देश की लगाम रावण के अधीन  है 

क्यों जला रहा है तन को, सीने को तपा ज़रा
एक गोली सह सके न शोर क्यों मचा रहा 

क्या तेरा भी शेर/पुत्र उन पहोड़ो पे दहाड़ता 
सेंद जो लगाये दुश्मनों को है उखाड़ता 

सीने पे चट्टान थामे बर्फ को गला रहा 
वीर रस की लौ को अपने लहू से सुलगा रहा 

संविधान गिर पड़ा है, माता लहुलुहान है 
मज़हबो के नाम बंट गया ये हिन्दुस्तान है 

शिवो अहम् -शिवो अहम् -शिवो अहम् तू बोलदे 
ललाट में जो नेत्र है उसको फिर से खोल दे 

अश्क सुर्ख हैं लहू के, तू भी तो पिघल जरा
कंठ के हलाहल को मुख से तू उगल जरा 

कारगिल युद्ध नहीं मानवता संग्राम है 
चोट काश्मीर की तड़पता ग्राम ग्राम है 

मुझमे एक क्रांति वीर की मशाल है जले
गांधीवाद है विवाद, सियासतों के सिलसिले

मुझको पहचान लो ये मेरी हुंकार है 
वीर रस की आड़ में नई क्रांति की गुहार है

सर उठा जो हाँ तेरी है मुजको तू संकेत दे
देश उठ खड़ा हो फिर से ऐसी एक भेंट दे

मैं कटा चूका हूँ सर को देख तेरे सामने
महाकाल साथ लाया हूँ मैं हाथ तेरा थामने

किस बात का है भय तुझे ये तेरी मातृभूमि है
दुश्मनों के रक्त को ये कृपाण मेरी झूमी है 

झुमने लगी है खुद भी, इसको तू  नचा जरा
तृप्त हो सके ये फिरसे तृष्णा को बुझा जरा 

इन्कलाब-इन्कलाब मुठठी को यूँ तानले
हिंद्बाद है आबाद इसको फिर से जानले 

हो सके तो इसका क़र्ज़ तूने फिर चुकाना है
दुश्मनों के सर को सिर्फ काट कर झुकाना है 

ताकि बच सके न कोई दरिंदा अत्याचार का 
व्यर्थ जा सके न मेरा जन्म धर्माचार का -जन्म धर्माचार का-जन्म धर्माचार का 

जय हिन्द- जय हिन्द - जय हिन्द 
जय हिन्द - जय हिन्द - जय हिन्द 

वरुण पंवार 

"जुगनू हूँ मैं पल भर का"Jugnu hun main pal bhar ka

वो नज़ारा पुराना था वो बहाना पुराना था,
गर जो बात बिगड़ी है तो वो इरादा पुराना था,
बदल दी वो दुनिया बदल दी वो फितरत,
बना दो मुझे फिर नया जो शख्स पुराना था,

कोई अनजान होता ही है, कोई अनजान बन जाता है,
कोई, कोई और ही होता है, और फिर अपना बन जाता है,
तुझे पता है ये शानो शोकत तेरी नहीं है फिर भी,
कोई जहाँ में घुल जाता है और कोई जहाँ भूल जाता है,

जुगनू हूँ मैं पल भर का, रहने दो मुझे शामियाने में,
डरता हूँ जिन्दगी से पर रहता हूँ आशियाने में,
कैसा सफ़र तय कर रहा हूँ इस पञ्च तत्व में रहकर,
आत्मा तड़प जाती है वो इज्ज़त कमाने में, 

वरुण पंवार

"मंजिलें तेरी हैं कहाँ तक" Manzile teri hain kahan tak

किसी परिंदे से मत पूछो कि उसका आसमा कहाँ तक है, 
महज देख लो उसकी उड़ान है कहाँ तक,

मुतमईन न होना उसका हुनर देखके,
आखिर उसकी भी जमीं है हमारी जमीं तक,

वहां तो हवा का कहर ही बदल देती है मंजिले उसकी, 
देखले कितनी मज़बूत मंजिलें तेरी हैं कहाँ तक, 

दिन में ही नाप सकता है वो सफ़र अपना, 
यहाँ दिन-रात तेरी देख ले तू जाग सकता है कहाँ तक,

चुगना, उड़ना, बसेरा, चूजे, बस ये संसार हैं उसके,
इंसान है तू परिंदा बनकर रहेगा कब तक,

हर रोज़ एक नया संसार बना, कुछ नया बना,
क्यों सिमटा है इस पल में, जो बीत गया है कल तक,

वरुण पंवार

"डर लगता है" Darr lagta hai

दुश्मनों के बीच लिए जामों से नहीं ग़मों  के बीच पिए जामों से डर लगता है,
और मुहब्बत करना एक गुनाह है इस ज़माने में, महज उसके अंजामो से डर लगता है,

कोई हमें याद करे न करे मगर, उसकी हर बार की दुआओं  से डर लगता है,
बिना सज़ा के ही कैसे कैद हो जाते हैं दो दिल उन सज़ाओं से डर लगता है,

रोक नहीं पाए खुद को मुजरिम बनाने से, अब हर इन्साफ से डर लगता है,
और कई बेकसूर आज भी मुहब्बत के अंजाम से अनजान हैं, उन इंसान से डर लगता है,

कॉलेज के प्रागंण में उसकी गैरमौजूदगी से नहीं, अपनी ही तन्हाई से डर लगता है,
कहीं मिल न जाए फिर से किसी मोड़ पर वो अब अपनी ही वफाई से डर लगता है,

दुनिया के दिखावे से नहीं, आशिकी के उन नज़ारों से डर लगता है,
बेठे रहते थे उन दीवारों के सहारे हम अब उन दीवारों से ही डर लगता है,

सर्दियों की रात में छत पर ठिठुरते हुई फ़ोन पर बात नहीं, बात न होने से डर लगता है,
और अब तो आलम ये है कि गर्मियों की रातो में उस छत पर जाने से ही डर  लगता है,

उसकी कक्षा की ओर दौड़ से नहीं, उसकी गली के उस मोड़ से डर लगता है,
अब रास्ता बदल बदल कर चलते हैं हम, उसकी तरफ जाने वाली हर रोड से डर लगता है,

वरुण पंवार 

"उठो वीर तुम खड़ग उठाओ" Utho veer tum khadag uthao

शामिल हुआ जब मैं तो वो एक भीड़ थी,
देखते-देखते ही वो सारे मेरे अपने हो गए, 

शोर फिर चीख और सन्नाटे में बदल गया,
एक हाथ मेरे हाथ में देकर एक शख्स खो गया,

दशा बयां करूँ या फिर नैन भिगोऊँ,
धड हिलाऊँ या फिर सर उठाऊँ,

पैर नहीं बस उसका हाथ ही था,
जाने से पहले वो मेरे साथ ही था, 

दहशत जीवन का एक पहलु ऐसा,
मृत्यु निश्चित तो फिर डरना कैसा,

मन-मौन यूँ कब तक मौन रहेगा,
देश है मेरा कब हर शख्स कहेगा,

दफ़न किया जो वो शर्मा था, जल गया वो खान था भाई,
हिन्दू , मुस्लिन, सिख, इसाई  देह समेट रहे हैं भाई,

देख कसाई पंडित बनकर मंदिर लूट रहा है वो, 
देख सियासी मन्त्र पड़कर भीड़ जुटा रहा है वो, 

बंद करो ये देख दिखावा, भीड़ भी तमाशीन हुई,
भेड़-चाल का जन्तर पहने, मानवता मशीन हुई,

उठो वीर तुम खड़ग उठाओ ऐसी एक हुंकार भरो, 
अमर बनो एक पुष्प खिलाओ, गद्दारों का संहार करो, 

वरुण पंवार 

"चुप रहते-रहते ही गुलज़ार हो गया" Chup rehte rehte gulzar ho gaya

महज देखने से करार आया तुझे, मगर प्यास मेरी अभी बुझी ही नहीं,
रास न आया कभी औपचारिक मिलना तेरा, शायद निगाहें कभी उलझी ही  नहीं,

कहते हो कि कहती हैं निगाहें आपकी, कभी तो सुना होता लफ्ज को मेरे,
चुप रहते-रहते ही गुलज़ार हो गया, रखा होता कभी हाथ भी नव्ज़ पर मेरे, 

अब शिकायत के दौर यूँ शुरू हो गए, अफ़साने तो बनाये होते मिलने के दौर में, 
क्या सोच कर याद करोगे हमें, जो घिरे रहते हो व्यस्तता के उस शोर में, 

सेर-सपाटे तेरे बस घर के उस आँगन तक ही सिमट जायेंगे, 
ये सोच के तो बढ़ा लेती कदम, कि हम लौट के फिर न आयेंगे,

दो दिन का मिलना भी फिर दो दिल का मिलना बन जाएगा,
छोड़ो फ़िज़ूल का है ये मौसम मेरा , कौन इसे समझ पायेगा, 

शायद इंतज़ार ही नहीं तुझे मेरा कि मैं पास होके भी दूर होता हूँ,
तेरे संदेशो से दिल बहलता नहीं, तुझे हर बार ये कहता हूँ, 

मेरी बेकरारी बेअसर होती गई, इंतज़ार-ऐ-मज़ा भी जाता रहा, 
निगाहें भिगोये झुकाते चला, तेरा मुस्कुराना सताता रहा,

न फ़साने, बहाने न यादों में तुम, तराने समेटे भी रहते हैं गुम,
बेकदर-बेअसर तेरा संसार ये, न कहना कभी मुझसे प्यार है, 

वरुण पंवार

"आशिक डूबा परिंदा है" Aashiq duba parinda hai


आशिक डूबा परिंदा है, उसे डूबा ही रहने दो,
मुहब्बत प्यार का दरिया है, उस दरिया को बहने दो,
कोई ये कह नहीं सकता परिंदा उड़ रहा होगा,
मुहब्बत चीज ही ऐसी है, कोई भी डूब जाता है,

मोहब्बत खेल का प्रांगण है, इसमें खेलते रहना
अगर जो हार होती है, तो उसको झेलते रहना,
यहाँ दुश्मन कई सारे तेरे दर्शक बने बेठे,
अगर सच्चा खिलाडी है तो एक दिन जीत जायेगा, 

यहाँ पर इश्क और किस्मत के बाज़ीगर बड़े बेठे,
बड़ी इस भीड़ में कितने, मुहब्बत को गवा बेठे,
यहाँ गिरते हैं पत्ते पेड़ से सब, जब वसंत आए,
और कुश्किस्मत उन्हें कहते हैं जो उनपे ठहर जाते हैं,

वाहन  है मुहब्बत का सवारी भी जरुरी है,
तो मंजिल पे भी जाना है तो मकसद भी जरुरी है,
अगर खाली है जो गाडी तो मंजिल पे चले जाओ,
सवारी का क्या है वो कहीं पर मिल ही जायेगी,

ये पाठ है ऐसा जिसे कोई पढ  नहीं पता,
एहसास ही डिग्री है कि उसको सब कुछ है फिर आता, 
लिखना नहीं पढ़ना नहीं जो उसकी एक हाँ है तो, 
विफलता से सफलता का वो आनंद आ ही जाएगा, 

वरुण पंवार