Saturday, January 18, 2014

"उत्तराखंड ख़ास है" Uttrakhand khaas hai

चार धाम वो देव भूमि के स्वर्ग सिद्धि पथ कहलाते
जन जन है अभिलाशी ऐसा, धन्य -धन्य  हैं दर्शन जो पाते।

सर-सर पवन भी गीत लगाता, डाली-डाली नाच उठे तब,
छल-छल नदी भी  शोर मचाती, ऐसा लगे कि नाद  बजे तब।

बांज-बुरांस और चीड़-देवदार बीच बसा वो गाँव सुहाना,
बादल चुम्बन करे धरा पर, इंद्र धनुष का बना बिछोना,

पगडण्डी ही एक सड़क अनोखी, पैदल  दौड़े सबकी गाडी,
घर-आँगन और खेत सजाती धन्य-धन्य है पहाड़ी नारी।

कण-कण में ईश्वर है बसता, हृदय-हृदय पावन-पावन,
भावुकता हर प्राण-प्राण में, हर घर है यहाँ वृंदावन।

ढोल, दमो, तुरी स्वागत करते, मेलो का रंगीन मिजाज़,
डोली-डोली नंदा बसती, गाँव-गाँव में ईश्वरीय रिवाज।

मिटटी यहाँ की सोना उपजे, रक्त-रक्त बलिदानी है,
उत्तराखंड ही नहीं नाम यहाँ का, ये कई वीरो कि कहानी है।

क्या से क्या अब घटित हुआ जैसे श्रापित उत्तराखंड हुआ,
रूद्र रूप अवतरित हुआ और उत्तराखंड खंड-मंड  हुआ।

डामो की चोटों का श्रय, हर घाव-घाव दिख जाएगा,
बिजली कि तारो का फंदा, उत्तरांचल फांसी चढ़ जाएगा।

क़त्ल पहाड़ो का कर डाला, रक्त नदियों का जमा दिया,
देवजन भाड़े के पर्वत खोजें, विकास है सर्वोच्य ये जता दिया।

गाँव-गाँव में  बाघ लगा है, जंगल-जंगल आग,
खेत-खेत भवन उपजे, अब क्या करना है साग?

देव संस्कृति लुप्त हुई अब, प्राण प्रतिष्टा बस दूरदर्शन,
बोली नरक सिधार गई,उसे अंग्रेजी देती है तर्पण।

विकास है या ये विनाश है, देवताओ को थोड़ी सी आस है,
करलो ध्यान, है ये अभियान कि '"उत्तराखंड ख़ास है "

वरुण पंवार 

Thursday, July 25, 2013

"समय का पहिया है, उम्र का सहारा है" Samay Ka Pahiya Hai, Umr Ka Sahara Hai

एक जहाँ की ख्वाईश थी, एक जहाँ बनाना है।
कांटो पे चल-चल कर, राहों को सजाना है।

एक ज़िद थी पाने की, एक गम था खोने का।
जब घर से था निकला, डर था गुम होने का।

परिश्रम की श्याही से, ये रेखाएं ही घिस दी।
आरजुओं की चक्की में, ये उंगलियाँ ही पिस दी।

पहले भी मैं रोया था, फिर आज मैं रोदूंगा।
कुछ आज कमाया है, कुछ कल भी बटोरुंगा।

दिन-रात मैं घूमा जब, निराशा के बादल थे।
दुनियां ये देखी तो, आशा के काजल थे।

एक राग अधूरा सा, फिर पूरा हो पाया।
एक से दो होकर, घर-बार समझ आया।

किलकारी आँगन में, जो गूंजी तो जाना।
बंटता है कैसे, प्यार का पयमाना।

ऊँगली की ऊँचाई, मुस्किल था पकड्पाना।
बरसो की कोशिश अब एक लाठी मुझे पकड़ना।

समय की शाजिस बस, मुरझाये ऐनक भी।
पक गयी दाड़ी तो, बन गए हम लेखक भी।

एक पगड़ी है सर की, संभाल के रखना रे।
इज्ज़त की रोटी को, तुम घर में रखना रे।

एक भार ये मेरा भी,तू उठाले रे बच्चे।
चार काँधे बस, अब जुटाले तू अच्छे।

ना कुछ ये मेरा था, न ये कुछ तेरा है।
समय का पहिया है, उम्र का सहारा है।


वरुण पंवार

Friday, June 7, 2013

जपले भजले प्रभु-प्रभु , Japle Bhajle Prabhu-Prabhu

गुरु शहस्त्र गुरुबानी बोले गुरु ग्रन्थ का दीवाना होके,
बहती धारा रही धरा पर एक चंचल मन मंदिर सा होके,

जितना तेरा हासिल उतना मेरा कुछ कुछ बाकी,
प्रभु नशा बसे रोम रोम, फिर मदिरा नशा न साकी,

कोई परिंदा उड़ता न जो नाम परिंदा भी उड़ जाता,
प्रभु रंग चढ़ जाता जिस पर, नाम वो नहीं मिट पता,

सब खजाना जग ने जाना, एक खाजाना जो पाया तो,
बिन खोजे जो मिल पाया, वो ही प्रभु को भज पाया सो,

रज-रज मोती पद-पद बिखरे जो पद चूमे सुखी हुआ,
मन जिस में घर रब का न हो, जिसमे मंदिर वो घर हुआ,

वरुण पंवार

Monday, May 20, 2013

"कवी की परिभाषा" kavi ki paribhasha

कवी की कल्पना एक नया जहाँन की तलाश होती है,
बनके भंवर वो फूलों की महक में भी खो जाता है,
या बनके सपना कभी भी किसीका हो जाता है,
उसके जहाँ का प्रमाण बस उसकी मौजूदगी है,
लहू में भी घुल कर रगों में तूफ़ान भर देता है,
बनके फ़रिश्ता भगवान् को पत्थर कर देता है,
कैसे मौसम से रूबरू होता है,कि हँसते हँसते ही रो देता है,
एक ही कहानी लिखते कहीं कई कलम रुक जाती हैं,
और एक अक्षर पड़कर कई निगाहें झुक जाती हैं,
खुद में खुद को उतार कर एक शाजिश करता है ,
बदनाम होकर भी और गुंजाइश रखता है,
हर स्वाद को चख लेने की ही जुस्तजू में रहता है,
लिख कर डंस लेता है जुबान से कुछ नहीं कहता है,
ख़्वाबों में भी ख़्वाबों का कारवां चलता है,
समंदर की लहरों पर भी एक आशियाना पलता है,
दीदार रोज़ करता है अपने हमसफ़र का वो,
कुर्बानी भी एक आदात ,दिलो-जिगर का वो,
पागल है वो, जख्मो को देखे तो घायल है वो,
सूनी आँखों का काजल, पैरों की पायल है वो,
सच कहूँ तो फिर एक आतंकी बादल है वो,
काट कर हतेली नाम भी लिखता है वो,
सुने ख़्वाबों में सपनो के रंग भरता है वो,
एक कविता उसकी दीवानी, तो वो आशिक उसका,
खुश्क दरिया में रवानी, तो वो हासिल उसका,
कोई देह ऐसा नहीं जिसकी कोई छवि नहीं,
और कोई संसार ढूँढो ऐसा जहाँ कोई कवी नहीं,
ढूँढ लो कहीं भी जहाँ भी रब रचता है,
रब से पहले भी एक सोच कि कवी बसता है,

Monday, April 29, 2013

"ये उम्र कहती है की मैं फिर आउंगी तुझसे मिलने" ye umar kehti hai ki main fir aaungi tuzhse milne

एक अंगड़ाई में नीद की सलवटें अक्सर नजर आती हैं,
एक जाम में सदियों की उम्र गुजर जाती है 
कोई कहता है जिंदगी चलती का नाम गाडी है,
अच्छा हमसफ़र मिलजाए तो जिन्दगी संवर जाती है

देखो किसी किनारे दरिया के एक सेतु किसी उम्मीद में रहता है,
हवा के जोर से रेत का मजमा उसपे बेठा मिलता है
यहाँ तुम किस्मत के धनि हो तो ही बात बनती है,
वरना समंदर बन ने की जुस्तजू में बादल भी पिघल जाता है  

मैं चलता रहूँ बस सहारा रहे मेरे उन होंसलों का,
फ़िक्र बस इतनी मेरी दीवानगी न नीलाम हो जाये
मैं ये भी जानता हूँ की मेरा ठिकाना फिर कहाँ होगा, 
कि  परिंदा आस्मां को छूने में जब नाकाम हो जाए

हर सुबह का सूरज दिन का पयमाना बनाता है,
हर श्याम कहती है अभी मैं होश में हूँ
जिन्दगी भी नशे का एक ग़मगीन तौफा है,
फर्क इतना ही है कि इसे इंसान बनाता है

ये सफ़र मेरा आखरी सलाम का मोहताज़ है,
न मैं जानू, न जिन्दगी कि कौन कितना ख़ास है
ये उम्र कहती है की मैं फिर आउंगी तुझसे मिलने,
बस साफ़ करदे मनसूबे कि ऐसी कौन सी प्यास है

वरुण पंवार 

Sunday, April 7, 2013

"आजादी हिन्दुस्तान की आदत "Azaadi hindustan ki aadat


एक क्रन्तिकारी की आत्मा का ये क्रांति आगाज़ है, आया है देश वासियों को जगाने और हिंदुस्तान की आदत यानी आजादी फिर एक बार मांगने। 

क्या जतन की है कमी, या सरफ़रोश मैं नहीं
क्या लहू का जलजला रगों में ही दिखा नहीं

क्या हमारी सेना आज शवो की दूकान है
या भ्रम में है वतन आज़ादी की थकान है 

चोराहे नाम के बने जो क्रांति शूरवीर हैं
भीख तुमसे मांगते आज़ादी के शौक़ीन हैं 

एक कलम की नौक से मैं तीर को तपा रहा 
जुबान की कमान में मैं शोलों को सजा रहा 

गर अगर लहू बहे तो रौंगटे सलाम दें 
गर न उठ सका तो मुझको हौंसले उड़ान दें 

कैसे आर्याव्रत में आतंकी गीत गा रहा 
स्वंतंत्रता की शय्या  पर मासूमों को सजा रहा 

शहीदों की शहादतों का कैसा तौफा है मिला 
तिरंगे की जुबान पर अंग्रेजी स्वाद है मिला 

तीन रंग ओढे बेठा कौन है वो देखले
देश जल रहा है, आग चाहे तू भी सेकले 

भ्रस्टाचारी राजनीति, कौरवो की जीत हैं
कृष्ण रो रहा है, अर्जुन भी भयभीत है 

राम लाचार, हनुमान शक्तिहीन है 
देश की लगाम रावण के अधीन  है 

क्यों जला रहा है तन को, सीने को तपा ज़रा
एक गोली सह सके न शोर क्यों मचा रहा 

क्या तेरा भी शेर/पुत्र उन पहोड़ो पे दहाड़ता 
सेंद जो लगाये दुश्मनों को है उखाड़ता 

सीने पे चट्टान थामे बर्फ को गला रहा 
वीर रस की लौ को अपने लहू से सुलगा रहा 

संविधान गिर पड़ा है, माता लहुलुहान है 
मज़हबो के नाम बंट गया ये हिन्दुस्तान है 

शिवो अहम् -शिवो अहम् -शिवो अहम् तू बोलदे 
ललाट में जो नेत्र है उसको फिर से खोल दे 

अश्क सुर्ख हैं लहू के, तू भी तो पिघल जरा
कंठ के हलाहल को मुख से तू उगल जरा 

कारगिल युद्ध नहीं मानवता संग्राम है 
चोट काश्मीर की तड़पता ग्राम ग्राम है 

मुझमे एक क्रांति वीर की मशाल है जले
गांधीवाद है विवाद, सियासतों के सिलसिले

मुझको पहचान लो ये मेरी हुंकार है 
वीर रस की आड़ में नई क्रांति की गुहार है

सर उठा जो हाँ तेरी है मुजको तू संकेत दे
देश उठ खड़ा हो फिर से ऐसी एक भेंट दे

मैं कटा चूका हूँ सर को देख तेरे सामने
महाकाल साथ लाया हूँ मैं हाथ तेरा थामने

किस बात का है भय तुझे ये तेरी मातृभूमि है
दुश्मनों के रक्त को ये कृपाण मेरी झूमी है 

झुमने लगी है खुद भी, इसको तू  नचा जरा
तृप्त हो सके ये फिरसे तृष्णा को बुझा जरा 

इन्कलाब-इन्कलाब मुठठी को यूँ तानले
हिंद्बाद है आबाद इसको फिर से जानले 

हो सके तो इसका क़र्ज़ तूने फिर चुकाना है
दुश्मनों के सर को सिर्फ काट कर झुकाना है 

ताकि बच सके न कोई दरिंदा अत्याचार का 
व्यर्थ जा सके न मेरा जन्म धर्माचार का -जन्म धर्माचार का-जन्म धर्माचार का 

जय हिन्द- जय हिन्द - जय हिन्द 
जय हिन्द - जय हिन्द - जय हिन्द 

वरुण पंवार 

Wednesday, March 13, 2013

"जुगनू हूँ मैं पल भर का"Jugnu hun main pal bhar ka

वो नज़ारा पुराना था वो बहाना पुराना था,
गर जो बात बिगड़ी है तो वो इरादा पुराना था,
बदल दी वो दुनिया बदल दी वो फितरत,
बना दो मुझे फिर नया जो शख्स पुराना था,

कोई अनजान होता ही है, कोई अनजान बन जाता है,
कोई, कोई और ही होता है, और फिर अपना बन जाता है,
तुझे पता है ये शानो शोकत तेरी नहीं है फिर भी,
कोई जहाँ में घुल जाता है और कोई जहाँ भूल जाता है,

जुगनू हूँ मैं पल भर का, रहने दो मुझे शामियाने में,
डरता हूँ जिन्दगी से पर रहता हूँ आशियाने में,
कैसा सफ़र तय कर रहा हूँ इस पञ्च तत्व में रहकर,
आत्मा तड़प जाती है वो इज्ज़त कमाने में, 

वरुण पंवार

Monday, March 4, 2013

"मंजिलें तेरी हैं कहाँ तक" Manzile teri hain kahan tak

किसी परिंदे से मत पूछो कि उसका आसमा कहाँ तक है, 
महज देख लो उसकी उड़ान है कहाँ तक,

मुतमईन न होना उसका हुनर देखके,
आखिर उसकी भी जमीं है हमारी जमीं तक,

वहां तो हवा का कहर ही बदल देती है मंजिले उसकी, 
देखले कितनी मज़बूत मंजिलें तेरी हैं कहाँ तक, 

दिन में ही नाप सकता है वो सफ़र अपना, 
यहाँ दिन-रात तेरी देख ले तू जाग सकता है कहाँ तक,

चुगना, उड़ना, बसेरा, चूजे, बस ये संसार हैं उसके,
इंसान है तू परिंदा बनकर रहेगा कब तक,

हर रोज़ एक नया संसार बना, कुछ नया बना,
क्यों सिमटा है इस पल में, जो बीत गया है कल तक,

वरुण पंवार

Sunday, February 24, 2013

"डर लगता है" Darr lagta hai

दुश्मनों के बीच लिए जामों से नहीं ग़मों  के बीच पिए जामों से डर लगता है,
और मुहब्बत करना एक गुनाह है इस ज़माने में, महज उसके अंजामो से डर लगता है,

कोई हमें याद करे न करे मगर, उसकी हर बार की दुआओं  से डर लगता है,
बिना सज़ा के ही कैसे कैद हो जाते हैं दो दिल उन सज़ाओं से डर लगता है,

रोक नहीं पाए खुद को मुजरिम बनाने से, अब हर इन्साफ से डर लगता है,
और कई बेकसूर आज भी मुहब्बत के अंजाम से अनजान हैं, उन इंसान से डर लगता है,

कॉलेज के प्रागंण में उसकी गैरमौजूदगी से नहीं, अपनी ही तन्हाई से डर लगता है,
कहीं मिल न जाए फिर से किसी मोड़ पर वो अब अपनी ही वफाई से डर लगता है,

दुनिया के दिखावे से नहीं, आशिकी के उन नज़ारों से डर लगता है,
बेठे रहते थे उन दीवारों के सहारे हम अब उन दीवारों से ही डर लगता है,

सर्दियों की रात में छत पर ठिठुरते हुई फ़ोन पर बात नहीं, बात न होने से डर लगता है,
और अब तो आलम ये है कि गर्मियों की रातो में उस छत पर जाने से ही डर  लगता है,

उसकी कक्षा की ओर दौड़ से नहीं, उसकी गली के उस मोड़ से डर लगता है,
अब रास्ता बदल बदल कर चलते हैं हम, उसकी तरफ जाने वाली हर रोड से डर लगता है,

वरुण पंवार 

Friday, February 22, 2013

"उठो वीर तुम खड़ग उठाओ" Utho veer tum khadag uthao

शामिल हुआ जब मैं तो वो एक भीड़ थी,
देखते-देखते ही वो सारे मेरे अपने हो गए, 

शोर फिर चीख और सन्नाटे में बदल गया,
एक हाथ मेरे हाथ में देकर एक शख्स खो गया,

दशा बयां करूँ या फिर नैन भिगोऊँ,
धड हिलाऊँ या फिर सर उठाऊँ,

पैर नहीं बस उसका हाथ ही था,
जाने से पहले वो मेरे साथ ही था, 

दहशत जीवन का एक पहलु ऐसा,
मृत्यु निश्चित तो फिर डरना कैसा,

मन-मौन यूँ कब तक मौन रहेगा,
देश है मेरा कब हर शख्स कहेगा,

दफ़न किया जो वो शर्मा था, जल गया वो खान था भाई,
हिन्दू , मुस्लिन, सिख, इसाई  देह समेट रहे हैं भाई,

देख कसाई पंडित बनकर मंदिर लूट रहा है वो, 
देख सियासी मन्त्र पड़कर भीड़ जुटा रहा है वो, 

बंद करो ये देख दिखावा, भीड़ भी तमाशीन हुई,
भेड़-चाल का जन्तर पहने, मानवता मशीन हुई,

उठो वीर तुम खड़ग उठाओ ऐसी एक हुंकार भरो, 
अमर बनो एक पुष्प खिलाओ, गद्दारों का संहार करो, 

वरुण पंवार 

Tuesday, February 19, 2013

"चुप रहते-रहते ही गुलज़ार हो गया" Chup rehte rehte gulzar ho gaya

महज देखने से करार आया तुझे, मगर प्यास मेरी अभी बुझी ही नहीं,
रास न आया कभी औपचारिक मिलना तेरा, शायद निगाहें कभी उलझी ही  नहीं,

कहते हो कि कहती हैं निगाहें आपकी, कभी तो सुना होता लफ्ज को मेरे,
चुप रहते-रहते ही गुलज़ार हो गया, रखा होता कभी हाथ भी नव्ज़ पर मेरे, 

अब शिकायत के दौर यूँ शुरू हो गए, अफ़साने तो बनाये होते मिलने के दौर में, 
क्या सोच कर याद करोगे हमें, जो घिरे रहते हो व्यस्तता के उस शोर में, 

सेर-सपाटे तेरे बस घर के उस आँगन तक ही सिमट जायेंगे, 
ये सोच के तो बढ़ा लेती कदम, कि हम लौट के फिर न आयेंगे,

दो दिन का मिलना भी फिर दो दिल का मिलना बन जाएगा,
छोड़ो फ़िज़ूल का है ये मौसम मेरा , कौन इसे समझ पायेगा, 

शायद इंतज़ार ही नहीं तुझे मेरा कि मैं पास होके भी दूर होता हूँ,
तेरे संदेशो से दिल बहलता नहीं, तुझे हर बार ये कहता हूँ, 

मेरी बेकरारी बेअसर होती गई, इंतज़ार-ऐ-मज़ा भी जाता रहा, 
निगाहें भिगोये झुकाते चला, तेरा मुस्कुराना सताता रहा,

न फ़साने, बहाने न यादों में तुम, तराने समेटे भी रहते हैं गुम,
बेकदर-बेअसर तेरा संसार ये, न कहना कभी मुझसे प्यार है, 

वरुण पंवार

Monday, February 18, 2013

"आशिक डूबा परिंदा है" Aashiq duba parinda hai


आशिक डूबा परिंदा है, उसे डूबा ही रहने दो,
मुहब्बत प्यार का दरिया है, उस दरिया को बहने दो,
कोई ये कह नहीं सकता परिंदा उड़ रहा होगा,
मुहब्बत चीज ही ऐसी है, कोई भी डूब जाता है,

मोहब्बत खेल का प्रांगण है, इसमें खेलते रहना
अगर जो हार होती है, तो उसको झेलते रहना,
यहाँ दुश्मन कई सारे तेरे दर्शक बने बेठे,
अगर सच्चा खिलाडी है तो एक दिन जीत जायेगा, 

यहाँ पर इश्क और किस्मत के बाज़ीगर बड़े बेठे,
बड़ी इस भीड़ में कितने, मुहब्बत को गवा बेठे,
यहाँ गिरते हैं पत्ते पेड़ से सब, जब वसंत आए,
और कुश्किस्मत उन्हें कहते हैं जो उनपे ठहर जाते हैं,

वाहन  है मुहब्बत का सवारी भी जरुरी है,
तो मंजिल पे भी जाना है तो मकसद भी जरुरी है,
अगर खाली है जो गाडी तो मंजिल पे चले जाओ,
सवारी का क्या है वो कहीं पर मिल ही जायेगी,

ये पाठ है ऐसा जिसे कोई पढ  नहीं पता,
एहसास ही डिग्री है कि उसको सब कुछ है फिर आता, 
लिखना नहीं पढ़ना नहीं जो उसकी एक हाँ है तो, 
विफलता से सफलता का वो आनंद आ ही जाएगा, 

वरुण पंवार

Sunday, February 3, 2013

"बेटा तुझे उस मुकाम तक पहुंचना है" Beta tujhe us mukaam tak pahunchna hai

पिताजी  कहते हैं, बेटा तुझे उस मुकाम तक पहुंचना है,
मैंने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कह दिया जी पिताजी,

मैं बड़ा होता गया, मेरी जरूरते बढती गई, मेरा लक्ष्य भी बड़ा होता गया,
फिर जहन  में एक आवाज़ गूंजती है, बेटा  तुझे उस मुकाम तक पहुंचना है,

मैंने खुद को इस काबिल बनाया की, मैं सबको अपना कहने लगा, 
सबका दर्द समझने लगा, फिर एक आवाज़ गूंजती है, बेटा  तुझे उस मुकाम तक पहुंचना है,

मेरी हर एक पंक्ति में शब्दों का इजाफा होने लगा, क्या पता मेरा मुकाम कहाँ तक है,
जिंदगी जहाँ तक है मेरा मुकाम वहां तक है, बस मुकाम ढूँढ़ते इतना इंतज़ार हो गया है,

कि  उस शब्द का एक हिस्सा मेरे जीवन से जुड़ गया, मैं जान गया मेरा मुकाम कहाँ तक है,
पर सच्चाई के सहारे मुझे उस बुलंदी को छूना है, कि मैं भी फक्र से कह सकूँ, "बेटा तुझे उस मुकाम तक पहुंचना है"

वरुण पंवार